29 साल से सिकुड़ रहा सिंगरौली, 353 प्रतिशत बढ़ा कोयला क्षेत्र, आने वाले समय में आप ढूढेंगे सिंगरौली को
पिछले तीन दशकों के दौरान कोयला खनन ने ऊर्जाधानी सिंगरौली की धरती की तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। एक वैज्ञानिक अध्ययन में ऊर्जाधानी की यह बदली हुई तस्वीर की काफी चौंकाने वाली स्थितियां सामने आयी हैं। इस अध्ययन के अनुसार 1990 से 2019 के बीच महज 29 वर्षों में सिंगरौली कोलफील्ड का खनन क्षेत्र 352.61 प्रतिशत बढ़ गया। वर्ष 1990 में जहां खदानों और मिट्टी-पत्थर के डंप (ओवरबर्डन) का कुल क्षेत्रफल 19.56 वर्ग किलोमीटर (4.39 प्रतिशत) था,
Vijay
सिंगरौली -
पिछले तीन दशकों के दौरान कोयला खनन ने ऊर्जाधानी सिंगरौली की धरती की तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। एक वैज्ञानिक अध्ययन में ऊर्जाधानी की यह बदली हुई तस्वीर की काफी चौंकाने वाली स्थितियां सामने आयी हैं। इस अध्ययन के अनुसार 1990 से 2019 के बीच महज 29 वर्षों में सिंगरौली कोलफील्ड का खनन क्षेत्र 352.61 प्रतिशत बढ़ गया। वर्ष 1990 में जहां खदानों और मिट्टी-पत्थर के डंप (ओवरबर्डन) का कुल क्षेत्रफल 19.56 वर्ग किलोमीटर (4.39 प्रतिशत) था,
वहीं 2019 तक यह बढ़कर 88.53 वर्ग किलोमीटर (19.88 प्रतिशत) हो गया। यानी करीब 69 वर्ग किलोमीटर अतिरिक्त भूमि खनन गतिविधियों में शामिल हो गईं। इस अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार 1990 से 2000 के बीच खनन क्षेत्र में लगभग 44 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसके बाद 2000 से 2009 के बीच यह करीब 60 प्रतिशत बढ़ा। सबसे अधिक विस्तार 2009 से 2019 के दौरान हुआ,
जब खनन क्षेत्र लगभग दोगुना होकर 44.93 वर्ग किलोमीटर से 88.53 वर्ग किलोमीटर पहुंच गया। ऐसे में आज से करीब सात वर्ष पूर्व के हालातों की इस रिपोर्ट से आसानी से अनुमान लगाना गलत नहीं कि आजकल जो विपरीत पर्यावरणीय स्थितियां देखने को मिलती हैं उनके लिए कहीं न कहीं यहां तेजी से बढ़ता खनन व तेजी से घटता वन है।
एक नजर शोधकर्ताओं और शोध की थीम पर
यह अध्ययन आईआईटी (बीएचयू) वाराणसी के माइनिंग इंजीनियरिंग विभाग के अश्वनी कुमार सोनकर, डॉ. आरिफ जमाल, डॉ. विजयेन्द्र प्रताप धीरज और जीबी पंत इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी उत्तराखंड के डॉ. हीरा लाल यादव व डॉ. सरीश चंद्रवंशी संयुक्त रूप से किया है। यह शोध जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस में 25 मई 2026 को ऑनलाइन प्रकाशित हुआ।
शोधपत्र 9 अक्टूबर 2025 को प्राप्त हुआ, 23 जनवरी 2026 को संशोधित किया गया और 8 फरवरी 2026 को प्रकाशन के लिए स्वीकृत किया गया। यह प्रकाशित वैज्ञानिक शोध सिंगरौली कोलफील्ड
दूरसंवेदी तकनीक और भौगोलिक सूचना प्रणाली के माध्यम से भूमि उपयोग एवं भूमि आवरण में बदलाव का विश्लेषण में हुआ है। अध्ययन में 1990, 2000, 2009 और 2019 के उपग्रह चित्रों की तुलना कर भूमि उपयोग में हुए
बदलावों का आकलन किया गया।
परती भूमि भी तेजी से घटी
1990 में परती भूमि- 168.56 वर्ग किलोमीटर (37.86 प्रतिशत), 2019 में परती भूमि- 117.70 वर्ग किलोमीटर (26.43 प्रतिशत) , यानी लगभग 50.86 वर्ग किमी परती भूमि अन्य उपयोगों, विशेषकर खनन व विकास कार्यों में परिवर्तित हो गई।
निर्मित क्षेत्र में भी यूं हुआ बड़ा इजाफा
औद्योगिक विकास और नई बस्तियों के विस्तार के कारण निर्मित क्षेत्र भी तेजी से बढ़ा। वर्ष 1990 में निर्मित क्षेत्र 3.20 वर्ग किलोमीटर था। जबकि वर्ष 2019 में निर्मित क्षेत्र 9.24 वर्ग किलोमीटर हो गया। यानी लगभग 189 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इसमें नई कॉलोनियां, सड़कें, औद्योगिक परिसर और अन्य निर्माण कार्य शामिल हैं।
कृषि भूमि का क्षेत्र भी बढ़ा-
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1990 में कृषि भूमि 135.12 वर्ग किलोमीटर थी। जबकि वर्ष 2019 में कृषि भूमिका रकबा बढक़र 149.88 वर्ग किलोमीटर हो गया। शोधकर्ताओं के अनुसार भूमि उपयोग में बदलाव और सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के कारण कृषि क्षेत्र में भी वृद्धि दर्ज की गई।
29 साल में ऐसे सिकुड़ा वन क्षेत्र
खनन गतिविधियों से वन क्षेत्र को सबसे अधिक नुकसान हुआ। अध्ययन के अनुसार 1990 में वन एवं पहाड़ी क्षेत्र 14.65 वर्ग किलोमीटर (25.75 प्रतिशत) था। जबकि 2019 में वन एवं पहाड़ी क्षेत्र 71.82 वर्ग किलोमीटर (16.13 प्रतिशत) हो गया। यानी 42.83 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र कम हो गया, जो लगभग 37 प्रतिशत की गिरावट है। शोध में नए कोयला ब्लॉकों, खुली खदानों और औद्योगिक परियोजनाओं के विस्तार को इसका प्रमुख कारण बताया गया है।
445 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का किया गया अध्ययन
वैज्ञानिकों ने 445.21 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का अध्ययन उपग्रह चित्रों, दूरसंवेदी तकनीक और भौगोलिक सूचना प्रणाली की सहायता से किया। चार अलग-अलग वर्षों के आंकड़ों की तुलना से यह निष्कर्ष निकाला गया कि सिंगरौली का भू-दृश्य पिछले तीन दशकों में तेजी से बदला है और इसका सबसे बड़ा कारण कोयला खनन का लगातार विस्तार रहा है।
क्या कहता है इस अध्ययन का निष्कर्ष?
शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष में कहा है कि सिंगरौली में भूमि उपयोग में सबसे बड़ा परिवर्तन खुली कोयला खदानों के विस्तार के कारण आया है। यदि भविष्य में भी इसी गति से खनन बढ़ता रहा तो वन संरक्षण, भूमि प्रबंधन और खनन के बाद पर्यावरणीय पुनर्वास पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होगा, ताकि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके।
हर साल औसतन 2.38 वर्ग किलोमीटर बढ़ता गया
खनन क्षेत्र शोधकर्ताओं ने पाया कि 1990 से 2019 के बीच हर वर्ष औसतन 2.38 वर्ग किमी नई भूमि खनन के दायरे में आती गई। वहीं 2009 से 2019 के बीच यह गति और तेज होकर लगभग 4.36 वर्ग किमी प्रति वर्ष हो गई। अध्ययन में इसका मुख्य कारण खुली खदानों का तेजी से विस्तार बताया गया।